प्रायश्चित

कुछ दिनों पहले उत्तरवन के एक जनपद में शिक्षक सम्मेलन हुआ। मिंटू खरगोश भी उत्तरवन का शिक्षक होने के नाते इस सम्मेलन में सम्मिलित होने गया था।
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मुख्य अथिति माननीय सांसद पतलू हाथी जी थे। उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा उत्तरवन के शिक्षकों के पास अब गाड़ी है, वह बड़े-बड़े होटलों में रुके हैं, उनका वेतन बहुत बढ़ गया है।
मिंटू खरगोश को यह सच्चाई सुन बहुत ग्लानि हुयी। क्योंकि वह भी होटल में रुका था। उसका मन किया कि होटल को छोड़कर, सड़क के किनारे कहीं किसी दुकान के अहाते में लेट जाऊं या सड़क में खड़ी किसी गाड़ी के नीचे लेट जाता हूँ। पर ठंड इतनी थी कि हिम्मत नहीं हुयी कि ऐसा किया जा सके। मिंटू खरगोश ने मन ही मन भगवान से और सांसद जी से माफ़ी मांगी। तुच्छ प्राणि और ऊपर से शिक्षक होना, उसे और अपराध बोध करवा रहा था। एक शिक्षक जिसको भिक्षा मांगकर कर अपना जीवन चलाना चाहिए था, उसकी इतनी हिम्मत कि वह पांच सितारा होटल में रुका है। तंत्र पर अपने द्वारा की जा रही यह धृष्टता मिंटू खरोगोश को कचोटने लगी थी। सांसद महोदय की बातें, उसे रह रह कर, अपने द्वारा समाज पर किए जा रहे अन्याय की याद दिला रही थी। ऊपर से अपनी घूस-रिश्वत की कमाई से खरीदी गयी ‘अल्टो 800’ जिससे मिंटू खरगोश सम्मलेन में पहुँचा था। वह भी उसे कचोटने लगी थी। मिंटू खरगोश ने फिर मन ही मन माफ़ी मांगी कि मुझे पैदल ही आना चाहिए था या सांसद महोदय की तरह रोडवेज की बस में आना चाहिए था।
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मिंटू खरगोश को रोडवेज की बस में सांसदों/विधायकों के लिए आरक्षित सीट की याद आ गयी। बेचारे जनप्रतिनिधियों को कोई सीट भी नहीं देता, इसलिए उनकी सीट पर आरक्षित लिखना पड़ता है। बेचारे हमारे सांसद/विधायक आजादी के इतने वर्षो बाद, आज भी रोडवेज में सफर कर रहे हैं। उनके वेतन भत्ते तब से अब तक उतने ही हैं। और हम शिक्षक लोग अपनी कार में आना-जाना कर रहे हैं। मिंटू खरगोश का यह सोच कर अपराध बोध बढ़ता चला जा रहा था।
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उसे समाज के आम लोगों की बातें भी याद आने लगी- “इन मास्टरों की तनख्वा बहुत बढ़ गयी है।” सच में, यह कितनी बुरी बात है, हमारी तनख्वा तो कम होनी चाहिए थी। देश गरीब क्यों है? आज मिंटू खरगोश को एहसास हुआ, कि पूरे देश की गरीबी के कारण शिक्षक लोग ही हैं।
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नींद न आने के लिए यह कारण कोई कम नहीं थे। तब तक मिंटू खरगोश को पिछले वर्ष जून में जंगल के राष्ट्रपति जी की बात भी याद आ गयी। जिसमें उन्होंने कहा था कि – “शिक्षकों का वेतन उनसे भी ज्यादा है।” जंगल के प्रथम नागरिक से ज्यादा वेतन, लेना तो महा अन्याय है, जबकि सरकारी शिक्षक जंगल के सबसे अंतिम नागरिक हैं। मिंटू का अपराध बोध बहुत गहरा हो चुका है, नींद अब कोशों दूर चली गयी है। फाइव स्टार के नरम गद्दे, उसे अब काँटों की तरह चुभने लगे थे।
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अचानक होटल की खिड़की से एक कबूतर प्रकट हुआ। फाइव स्टार होटल के कमरे में कबूतर का आना अप्रत्यासित था, इसलिए मिंटू को समझ आ गया कि यह दिव्य कबूतर है। यह आया नहीं, बल्कि प्रकट हुआ है। मिंटू ने दोनों हाथ जोड़कर उसको प्रणाम किया और कहा- “कबूतर महाराज मुझे इस दुविधा से बाहर निकालो।”
कबूतर बोला – “इसके लिए तुमको प्रायश्चित करना होगा। प्रायश्चित हेतु तुमको देवप्रयाग संगम पर, जहाँ अलकनंदा और भागीरथी नदियाँ मिलकर, गंगा नाम की हो जाती हैं, पांच बार सूर्योदय से पहले डुबकी लगानी है। और साथ में एक दोहे का उच्चारण करना है –
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गुरु, सांसद दोऊ खड़े, काके लागों पाय।
सांसद बिन देश नाहीं, गुरु तो फ्री की खाय।
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यह कहकर कबूतर अंतर्धान हो गया।
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सुबह के 4 बज गए थे। सूर्योदय से पहले देवप्रयाग संगम पहुँचना था। मिंटू खरगोश ने मुंह धुलने के लिए गीजर ऑन किया। तो लाइट नहीं थी। पानी का नल खोला तो उसमें भी पानी नहीं आ रहा था। “कैसे फाइव स्टार होटल में रुका हूँ, जहाँ न लाइट है और न पानी।” – मिंटू खरगोश खुद में ही बड़बड़ाया। उसने बिना मुंह हाथ धुले चलने का निर्णय लिया। गाड़ी स्टार्ट की और देवप्रयाग संगम की तरफ चल पड़ा।
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