सीधी भर्ती का जिन्न  ( कहानी भाग – 1)

आज बारिश के कारण स्कूल की छुट्टी थी। इसलिए उठने की कोई जल्दी नहीं थी। मैंने थोड़ी देर बिस्तर में लेटे लेटे ही बारिश होने की आवाज को सुना और पुनः तसल्ली से लेट गया। मैं दुर्गम में नौकरी करने के इस आनन्द के बारे में सोचने लगा। यहाँ आप जोगी की तरह रहते हैं। अकेले। कोई परिवार का झंझट नहीं है। अब तो फोन हो गया, जब घर से फ़ोन आता है, तो लगता है कि अरे हम कोई जोगी नहीं सांसारिक मनुष्य हैं। वरना जीवन का अधिकांश हिस्सा ऐसे अकेले ही गुज़ार दिया। कोई आपको डिस्टर्ब करने वाला नहीं है। अगर छुट्टी है, तो आपको कोई टोकने वाला नहीं है। कब उठना है, कब खाना है, कब सोना है सब आपकी मर्जी पर निर्भर है। मैं अभी दुर्गम के बेनिफिट्स के बारे में सोच ही रहा था कि दरवाजे पर कुछ आवाज हुयी। मैंने सोचा बन्दर होंगे। क्योंकि सुबह बंदरों का समूह, मेरे कमरे के सामने से एक राउंड लगा कर जरूर जाता है। शायद वह एहसास दिलाने आते हैं कि गाँव से लोग भले ही पलायन कर रहे हों, पर आप लोग खुद को अकेला मत समझिये, हम हैं न।

पर दरवाजे की आवाज बन्द नहीं हुयी। जब तक मैं बन्दर के अलावा किसी और के होने के विकल्प के बारे में सोचता। तब तक आवाज़ आयी – “अरे, गुरूजी! अभी भी सो रहे हो? कितना सोओगे? उठ भी जाओ।”
मैंने आवाज पहचान ली। यह चिंतामणि जी थे। मैंने दरवाजा खोल दिया। चिंतामणि जी ने छाता बन्द किया। और जूते बाहर ही उतार दिए। छाता होने के बाद भी बारिश आपको भिगा ही देती है। ख़ासकर पैरों के निचले हिस्से को।

“आईये सर!” – मैंने उनका स्वागत किया और फिर अपने बिस्तर में लेट गया।

“अरे, गुरूजी! नौ बजने को हैं, आप अभी भी सो रहे हो?”

“सर! सोने का सबंध नींद से होता है। और नींद का नौ बजने से क्या लेना देना?” – मैंने कहा।

“आपका तर्क सही है। और सच में नींद का नौ बजने से कोई लेना देना नहीं है। पर नौ बजे तक सोते रहना एक खराब आदत मानी जाती है।” – चिंतामणि जी बोले।

“बस दो मिनट दीजिए, अभी उठता हूँ।”- मैंने कहा।

आज भी चिंतामणि जी का सुबह-सुबह आना, यह संकेत था कि इनको कोई चिंता खाये हुयी है। और जब तक यह मुझे अपनी बात सुना नहीं देते, यह परेशान रहेंगे। पर बात क्या होगी? मैं उठने की कोशिश में यही सोच रहा था। मैं उठ गया और हाथ मुँह धुल कर चाय बनाने लगा।

“कहिए सर, आप कैसे हैं?”- मैंने बात की शुरुआत की।

“अच्छा हूँ। आपने आज का अख़बार देखा ?” – उन्होंने पूछा।

“नहीं।”

“अरे, उतने बड़े आंदोलन के बाद जो प्रिंसिपल के लिए सीधी भर्ती स्थगित की गयी थी, उसका जिन्न पुनः बोतल से बाहर आ गया है। सरकार, स्थगित परीक्षा को पुनः बहाल करना चाहती है।”- चिंतामणि जी बोले।

अब मैं समझ गया कि आज वह क्यों आये हैं। अधिकांश शिक्षकों की तरह चिंतामणि जी भी इस मत के साथ हैं कि प्रिंसिपल के पद पर नियुक्ति, पूर्व नियमावली के अनुसार पदोन्नति से होनी चाहिए। कुछ शिक्षकों का मानना है कि प्रिंसिपल के पद पर परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति होनी चाहिए।

“तो इसमें दिक्क़त क्या है? हो जाने दो। परीक्षा से योग्यता, नेतृत्व क्षमता और अद्यतन ज्ञान की परीक्षा होगी। जिससे स्कूल्स को सक्षम नेतृत्व मिलेगा।” –  मैंने उनको छेड़ने के अंदाज में कहा।

“परीक्षा से केवल अद्यतन ज्ञान की परीक्षा हो सकती है। लेकिन नेतृत्व क्षमता का आकलन किसी प्रतियोगी परीक्षा से नहीं हो सकता है। अगर ऐसा होता, तो देश में चुनाव की जगह परीक्षा से नेतृत्व चुना जाता। नेतृत्व एक नैसर्गिक गुण है, वह परीक्षा और ज्ञान से ज्यादा अनुभव और व्यवहारिक समझ से आता है।

दूसरी बात आपने योग्यता की है, उसमें भी मेरी असहमति है। क्योंकि शिक्षक अपनी योग्यता को प्रमाणित करके ही शिक्षक बने हैं। इससे पूर्व में प्रधानाचार्य हेतु कोई परीक्षा नहीं हुयी, तो क्या यह माना जाय कि पहले के सभी प्रिंसिपल अयोग्य थे? क्योंकि वह पदोन्नति से आये, परीक्षा से नहीं?” -चिंतामणि जी ने अपनी बात रखी।

मैं समझ गया कि अब चर्चा लम्बी होने वाली है। चाय बन गयी थी। मैंने चाय का गिलास चिंतामणि जी को पकड़ाया।
………
जारी…..
………….

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