खिलाफ मत बोलो…

उत्तरवन के राजा पिंटू शेर की, जंगल के अधिकांश जानवर बड़ी तारीफ करते थे। कोई कहता-
“राजा जी, आपके जैसा राजा, इस उत्तरवन को आज से पहले कभी मिला ही नहीं। आप ने सच में हमारा दिल जीत लिया।”
कोई कहता- “राजा जी, हम आपकी कार्यशैली के बड़े कायल हैं। जब आप राजा नहीं थे तब भी आपने जो कार्य किए वह उत्तरवन के लिए बहुमूल्य थाती हैं।”
हालाँकि तारीफ करने वालों से कोई पूछ लेता कि कौन-कौन से कार्य किए, थोड़ा प्रकाश डाल पाएंगे ? तो शायद ही वह कोई जबाब दे पाते।
राजा जब भी अपनी तारीफ सुनते तो फूले नहीं समाते। सोशल मीडिया में भी वह केवल उन्हीं पोस्ट्स को पढ़ना पसन्द करते, जो उनकी तारीफ से ओत-प्रोत होती थी। जो भी सोशल मीडिया में उनके खिलाफ पोस्ट्स लिखते, उनकी एक फ़ाइल तैयार करने के लिए वाकायदा कुछ कर्मचारियों को अटैचमेंट पर राजदरबार में रखवा रखा था।
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इंटेलिजेंस टीम ने पाया कि सोशल मीडिया में अधिकांश पोस्ट्स लिखने वाले शिक्षक हैं। इनमें अधिकांश शिक्षक तो राजा की तारीफ ही करते हैं। पर कुछ अनुशासनहीन और जिद्दी शिक्षक राजा के कार्यों की आलोचना करते हैं। वह अपने को ज्यादा ही पढ़ा लिखा समझते हैं, और कहते हैं लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार सबको है। इन अनुशासनहीन शिक्षकों का मानना था कि अगर वही, सही को सही और गलत को गलत नहीं कहेंगे, तो अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का पोषण कैसे होगा ? हम बच्चों में इस संवैधानिक गुण को कैसे विकसित कर पाएंगे ?
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राजा की नजर ऐसे अनुशासनहीन लोगों पर तिरछी हो गयी। और उन्होंने इनको लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का निश्चय कर दिया। उन्होंने अपने मंत्री को आदेश दिया-
“इन मूर्खों को समझाओ कि लोकतंत्र तो दुनिया को दिखाने के लिए है, इतने सालों का इतिहास इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा। लोकतंत्र का मतलब केवल वोट देना है, उससे ज्यादा कुछ नहीं। यहाँ वही रहेगा जो हमारी तारीफ करेगा।”
राजा का आदेश पाते ही मंत्री ने घोषणा कर दी –
“जो भी सोशल मीडिया में राज परिवार और उसके किये कार्यों की आलोचना करेगा उसको नौकरी से निकाल दिया जाएगा।”
उत्तरवन में सन्नाटा पसर गया। सोशल मीडिया भी वीरान हो गया। कोई कुछ लिख ही नहीं पाया। पर कुछ खुरापाती जीव माने नहीं। मंत्री के बयान का सांकेतिक विरोध दर्ज कर दिया। यह अनुशासनहीनता अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले जिद्दी शिक्षकों ने कर दी।
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वही हुआ जो राजतंत्र में होता ही है। उनको सेवा से निलंबित कर दिया गया और जिन्होंने पोस्ट को लाइक किया था, उनका दुर्गम में ट्रांसफर कर दिया गया। और सबके लिए सख्त मुनादी कर दी गयी कि कोई भी शिक्षक केवल अपने काम से काम रखे, उसको राजपरिवार की किसी भी बात पर सोचने व बोलने की आवश्यकता नहीं है।
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हजारों शिक्षकों के मुँह और हाथ दोनों जैसे हैक कर दिए गए हों। जब पत्रकारों ने पूछा आप लोग कुछ बोलते क्यों नहीं ? कुछ लिखते क्यों नहीं ? सबने एक ही जबाब दिया कि हमारा पासवर्ड हैक हो गया है। अब सभी जो भी लिखते, राजपरिवार की तारीफ में ही लिखने लगे।
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काफी दिनों बाद मंत्री जी का मन हुआ कि किसी स्कूल का मुआयना किया जाय। स्कूल तय कर दिया गया। सम्बन्धित स्कूल के प्रधानाचार्य की रात की नींद उड़ गई। शिक्षकों के साथ कई दौर की मीटिंग करके उनको समझा दिया गया। सभी अलर्ट रहें, कोई भी कमी नजर नहीं आनी चाहिए।
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आज मंत्री जी का दौरा था। काजू-बादाम, किशमिश व फलों की प्लेट सजा दी गयी थी। मंत्री आए उन्होंने जलपान किया। एमडीएम, समग्र शिक्षा व उपस्थिति रजिस्टर चेक किया।
प्रधानाचार्य का दिल धौंकनी की तरह चलता रहा। सब कुछ ठीक निबट गया। जाते-जाते मंत्री जी का, एक कक्षा को देखने का मन कर गया। कक्षा में पढ़ा रहे शिक्षक को इस बात का एहसास हो गया कि मंत्री जी उसकी कक्षा की तरफ आ रहे हैं।
शिक्षक ने सभी बच्चों को समझा दिया कि जब भी कोई आपसे बड़ा कक्षा में आता है, तो आप हमेशा उसके सम्मान के लिए खड़े होते हैं। पर अगर आज कोई कक्षा में आये तो, तो आप तब तक खड़े नहीं होंगे जब तक मैं नहीं कहूँ।
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मंत्री जी ने कक्षा में प्रवेश किया। कोई भी बच्चा उनके लिए खड़ा नहीं हुआ। वह भीतर ही भीतर तिलमिला उठे।
उन्होंने बच्चों से कुछ सवाल पूछे। बच्चे अधिकांश सवालों के जबाब नहीं दे पाए। यह काफी था शिक्षक को डांट लगाने के लिए।
“आप कर क्या रहे हो, बच्चे कुछ भी जबाब नहीं दे पा रहे ? विषय की बात तो छोड़ ही दीजिए। इनको आप यह तमीज भी नहीं सिखा पाए कि जब भी कोई बड़ा आता है तो उसको विश करना चाहिए, उनको कमसे कम खड़ा तो होना चाहिए था ?”- मंत्री जी ने शिक्षक को डांटते हुए कहा।
“सर, क्षमा करें। मैं ‘लाइफ साइंस’ का शिक्षक हूँ, ‘मॉरल साइंस’ का नहीं ? आप ने ही तो आदेश निकाला था कि शिक्षक को केवल अपने काम से काम रखना चाहिए। उसको अन्य बातों पर सोचने व बोलने की आवश्यकता नहीं है। तब से मैं केवल ‘लाइफ साइंस’ की बात करता हूँ। मैंने अन्य किसी भी बात पर बोलना बिल्कुल छोड़ दिया है।”
“प्रिंसिपल जी, अपने शिक्षक को बात करने की तमीज सिखाइए।”- मंत्री जी ने अब डांट का रुख प्रिंसिपल की ओर मोड़ दिया और स्कूल से बाहर निकल गए।

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